Monday, January 5, 2015

स्टॉकिंग As: भूत का भूत

कब्र पर घास, घास या दूब
दूब पड़ पड़ा-पड़ा ओस गया उब  
उब गए थे जॉन ‘पा’ कि चल रहा है क्या
समय से पूर्व मैं धरा में क्यों गया धरा
शांत थी हवा मगर वहां नहीं थी शान्ति
सत्य एक ओर था और एक ओर भ्रांति
तारा एक टूट गया, टूटे कई तार
विश्वास पर जो चल गया कटार


(ओंकारनाथ मिश्र, ऑर्चर्ड स्ट्रीट, ५ जनवरी २०१५)

Monday, December 15, 2014

दस साल बाद

दस  साल बाद
श्वेत, पीत और रक्त-वर्णी कुसुमों से इतर
ढूंढता हूँ एक ‘’नील-कुसुम’’
तत्पर, सद्क्षण, गमसुम-गुमसुम
चंद्रमुखी! खोयी है आकाशगंगाओं में
मैं खोया हूँ चन्द्र-शुआओं में  
और साथ है मेरे ह्रदय का यह सीमाहीन मरुथल
जिसमे जब-तब छलक जाता है मृगजल

दस साल बाद
अमीरी-गरीबी, हिंसा और प्रतिहिंसा के नियत स्तंभों के बीच
अब भी ढूंढता हूँ एक विचित्र आदमी मृत्युलोक के बीच
लेकिन सभी फंसे हैं स्वर्ग की अप्सराओं में
और जीवन के नाम रह गया है वही तंत्र
जिससे आखिरी दम तक उठापटक चलती रहेगी
त्रिजटा खडग थामे रहेगी, सीताएं दीप जलाएँगी
बाल्यखिल्य मंत्र बुद्बुदायेंगे
हम आये थे, चले चले जाएंगे

दस साल बाद
हम फिर सोचेंगे अगले दस साल बाद
हाथों में होगा जब नील-कुसुम
कम-कम तम होएगा गुम
मगर नील-कुसुम ‘’कहाँ किसे मिला है’’
तब भी अँधेरे कमरे में होगा एक दोमुंहा सांप
और हम ढूंढेंगे इसी बात का पता
कि इतनी रंगीन रात, फिर भी क्यों काली है
या फिर जीवन की चाल ही निराली है

(ओंकारनाथ मिश्र, ऑर्चर्ड स्ट्रीट, १५ दिसम्बर २०१४)


Wednesday, November 19, 2014

शीत के दिन आ गए हैं

शीत के दिन आ गए हैं
घन गगन पर छा गए है
पत्ते भी मुरझा गए हैं
और प्रगल्भा पूछती है कब मिलोगे
कब तलक कविता-मधुर से तुम छलोगे
फिर विरागी सुर में वो कुछ गा गए हैं
शीत के दिन आ गए हैं

सिन्धु छूकर वो निदय हो बह चली है
उसके चर्चों से चतुर्दिक खलबली है   
उसकी पैनी धार से विश्रब्ध हो ठहरे हैं सब
आयेगा लेकर दिवाकर अपनी रश्मि, तेज कब
सोचकर ये हम दुबक कर सो गए हैं
कल्पना के लोक में ज्यों खो गए हैं
और वहां भी फूल सब कुम्हला गए हैं
शीत के दिन आ गए हैं

‘’उनका मुख था शरद के उस चाँद जैसा
चाँद जैसा, शरद के उस चाँद जैसा’’
हमने उपमा ये, पुराणों में पढ़ी थी
व्यास जानें, ये उन्होंने क्यों गढ़ी थी
पर लालायित हो गए हम देखने
निकल आये नेत्र अपने सेंकने
पर जुन्हाई, मन ना भाई
सकल दृष्टि में जो आया, दाग था
मन में संचित, व्यास को उपराग था
हाय! मिथ्या क्यों हमें बतला गए हैं
शीत के दिन आ गए हैं

सृप्त था कवि, सुप्त था, अब जागता है
नक्तचर हो चाँद के संग भागता है  
पर निराशा ही छुपी थी भाम में
दाग कायम रात्रि के इस याम में
पृथ्वी जब तक, ये नहीं ढँक पायेगा
चाँद में, जी! दाग है, रह जाएगा
देखकर कहिये कि हम झुठला गए हैं?
शीत के दिन आ गए हैं

(ओंकारनाथ मिश्र, ऑर्चर्ड स्ट्रीट, १९ नवम्बर २०१४)

(बीते ६ नवम्बर को पूर्णिमा के चाँद की यह तस्वीर मैंने उतारी थी. आप भी देखिये)

Friday, November 14, 2014

अस्तित्व बोध

कुछ अधूरे शब्द
कुछ अधूरी ग़ज़लें
कुछ अधूरी कवितायें
यह अधूरा होश
शब्द, स्वप्न, साँसों में उलझा मन
और मन का यह अधूरापन
जो मेरी ताकत है
मेरी आशा है
मेरी प्रेरणा है
मेरी साधना है

आज लौट आया हूँ
उसी नदी के तट पर
पर नदी आगे बढ़ चुकी है 
तुम्हारी तरह
और मैं रह गया हूँ
तट की तरह, वहीँ पर 
जबकि मैं रवहीन हूँ
किसी और लोक में लीन हूँ 
यह तट चाहता है सुनना
फिर तुम्हारी पदचाप को
फिर तुम्हारे गीत को, आलाप को 

चाहता हूँ  दुबारा चल-चल कर
भरता रहूँ तुम्हारे पद-चिन्हों की रिक्तता को  
बताता रहूँ तट को बार-बार
उसकी असमर्थता के बारे में
जो नहीं देख पाता है
तुम्हारा अस्तित्व, मेरे अस्तित्व में 


(ओंकारनाथ मिश्र, समिट स्ट्रीट, १६ फ़रवरी २०१४)

Thursday, October 30, 2014

विचिंतन

कब तक मिथ्या के आवरण में
रौशनी भ्रम देती रहेगी
कब तक भ्रामक रंगों में बहकर
उम्मीद अपनी नैया खेती रहेगी ?

आप पन्नों में लिपटे इतिहास को बार-बार खोल लें  
वही शतरंज, वही बिसात, वही मोहरे
वही सज्जनों के अस्तित्व पर छाये
घने कोहरे, घने कोहरे
हर युग की यही व्यथा है
वही कल की कथा थी, वही आज की कथा है
नंगे, लम्पट हमें आदर्श का पाठ कहेंगे
और हम यही सोचते हुए जियेंगे
आदमी इतना क्यों गिरता जा रहा है

आँखें उठाकर देखो तो शुभ्र वसनों में छिपे
वही काले ह्रदय वाले उपदेश देते लोग
हाथों में गीता लेकर
कहते हैं कि मातृसेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं
मैं पूछता हूँ कोई चंगेज़, कोई औरंगजेब, कोई लाल
कब तब बजाएगा अपना गाल
कब तक उधेड़ेगा हम निर्दोषों की खाल
हम कब तक जलाएंगे गांधी मैदान या अल्बर्ट एक्का चौक पर
क्रांति की मशाल
और लौट जाएंगे दबे पाँव
एक रोटी और एक मुस्कान के लिए
शब्दों में नयी जान के लिए     

रात फिर हम सो जाएंगे
आशा की एक सुबह के स्वप्न में
जहाँ एक बगिया में पंछी चुनमुन गायेंगे
वही कवि-लोक की एक बगिया
सुनहले पंछियों की बगिया
लेकिन सुबह नींद खुलती है
तो रक्त से लथपथ सड़क पर खड़े तमाशबीन
कहते हैं हम सज्जन कितने हैं हीन
हम आत्मघाती नहीं हो सकते, हम जीते चले जाएंगे
हम पीते चले जाएंगे दर्द की एक-एक बूँद
कल सुबह होगी, कल शान्ति का साम्रज्य होगा
सुबह होती नहीं, सुबह होगी भी नहीं
हमने गले उतार-उतार के अपना अस्तित्व बनाया है
हम गले उतार उतार के ही अपना अस्तित्व बचायेंगे
जैवीय विकास जिस धुरी पर टिकी है उसे नहीं गिरने देंगे
कोई मरे तो मरे खुद को नहीं मरने देंगे

मृत्यु है शान्ति
शान्ति जीवन के नाम नहीं
जीवन के नाम है, फरेब, झूठ, दासता, मोह और माया
प्रेम और स्नेह की क्षणिक फुलझरियां, बिछोह के अंतहीन मरुस्थल
मरती हुई भावनाएं, संवेदनाएं, कृतघ्नता का साक्षी होकर
चुपचाप मुंह बंद कर चले जाना है जीवन
आप  मृत्यु की शय्या पर लिटे हर किसी से पूछ लें
तृप्त नहीं है जीवन
रिक्त है हर किसी का मन
सब साँसों का निबाह किये चलते हैं
उसी में आह और वाह किये चलते हैं

(ओंकारनाथ मिश्र, ऑर्चर्ड स्ट्रीट, २७ अक्टूबर २०१४)

   

Sunday, September 21, 2014

अणुमा-बोध

इस अंतहीन विस्तार में
मैं देखता हूँ चालाक, चतुर आँखें
सुनता हूँ, वासना की लपलपाती जीभ पर दौड़ते
वीर्यधारी महापुरुषों का उद्घोष
घोर तृप्ति, घोर संतोष
पाता हूँ, अपने कर्णपटों पर सुतिक्त स्वाद
आधुनिक सुप्रभ दुनिया का अपरिमित अभिमाद

शिखर है, शिखर-रोहण की अदम्य चाह है
ज्यों दिखता उसमे मृगजलीय प्रवाह है
मेरे सुख की जिद में, अनायास आबद्ध 
श्रृंगारवेगी सुनयनाओं की धाह है
ध्वनि उठती है, प्रतिध्वनि आती है
‘महाजनो येन गतः सः पन्था:’
मैं हँसता हूँ, ढूंढता हूँ कोई पथ
कोई निरंक मन, कोई वन-प्रांतर
कोई अनुसूया, कोई दशाश्वमेध घाट
वारा और असि के लुप्त कलकल स्वर

हर नंगे देह में मैंने छुपा देखा
जीवन के चार अक्षर और मृत्यु का अभिशप्त मंदिर
समय के फांस में कसमसाती कोशिकाएं
ईश् अनुस्मृतियों के क्षण में विस्तृत लालसाएं
चार अक्षरों के सम्मिलन में है जीवन
कहता रहा महापुरुषों से, एक वातानुकूलित गृह
नहीं अभीष्ट मेरे जीवन का
नहीं अभीष्ट मेरा, बवेरिया या बॉस्टन की मानिनी
जो पंथ मेरा है 'मटिहानी को गामिनी'
नहीं प्रेरणा मेरे, कायर देशद्रोहियों की मरोड़ी जीभें
नहीं स्वप्न मेरा यह ऋद्धिमय संसार
इस शापित विजय से सौख्य हो उन वीरों को
ऋद्धि हो उनके भरे तूणीरों को
मैं संघर्ष मांगता हूँ, मैं ताप मांगता हूँ
मैं मरोड़ी जीभों से छना हुआ शाप मांगता हूँ
मैं इतना ही जानता हूँ 
चार अक्षरों के जीवन में होते हैं कुछ साल
खिलखिलाकर हँसता है जिसपर मृत्यु का महाकाल


(ओंकारनाथ मिश्र, ऑर्चर्ड स्ट्रीट,  २१ सितम्बर २०१४)

Saturday, September 6, 2014

आदमी क्या चाहता है?

आमावस्या के टिमटिमाते तारों की फ़ौज के बीच से
पूर्णिमा की निर्मल विभा के बीच भागते हुए
मन बार-बार यही पूछता है-
आदमी क्या चाहता है?

रंगहीन, रव-हीन आकाश की शून्यता से भागकर  
इन्द्रधनुषी रंगों के बीच खड़ी वयसहीन आकृतियों से लिपटते हुए  
ध्वनित मन बार-बार यही पूछता है-
आदमी क्या चाहता है?

जय और पराजय की कुटिल कलाबाजी में
व्यर्थ विभ्रांतियों से म्लात, द्विधा-जात
मौली-लोलुप मन बार-बार यही पूछता है-
आदमी क्या चाहता है?

मृत्यु और जीवन के गवेषित पथों के बीच से
दीदारू किरण-पुंजो की लालसा में
विसौख्य धरे मन, बार-बार यही पूछता है-
आदमी क्या चाहता है?

मरु-कूपों को उलछने की जिद लिए
निष्ठ, अक्लांत मनु-सुतों से
मृन्मयी सांचा बार-बार यही पूछता है-
आदमी क्या चाहता है?

नागरी-जंग में लास-रत बेहोशों से
फूस के अपने घरों से दूर किये कोसों से
अर्थ-सिन्धु में पन्न, पतित के दोषों से
पश्चिम में धमके श्लेषित रूपोशों से
मन बार-बार यही पूछता है-
आदमी क्या चाहता है?

महलों के खंडहरों में कुत्ते भौंकते है
सभागारों में चुड़ैलें पायल बजाती है
सितारों के तार कसे हुए हैं
अफ़सोस !नहीं कोई यहाँ बसे हुए हैं
क्षणिक स्थैर्य के इन्ही प्रतिमानों से
मन बार-बार यही पूछता है-
आदमी क्या चाहता है?


(निहार रंजन, ऑर्चर्ड स्ट्रीट, ६ सितम्बर २०१४)

Thursday, August 28, 2014

परिवर्तन

विहान की पहली भास से
दिवस के अवकाश तक
पल-पल में सब, है जाता बदल
परिवर्तन रहा अपनी चाल चल

चढती, बढती, ढलती धूप
रात्रि का भीतिकर स्वरुप
लौटे विहग अपने नीड़ों में
जो गए थे प्रात निकल
परिवर्तन रहा अपनी चाल चल

पोटली लिए किसान
चले हैं  देख आसमान
हो अन्नवर्षा या अकाल
इस मौसम से उस मौसम
दाने से पौध, पौध से फसल
लिए ह्रदय में अकूत बल
कहाँ रुका है उनका हल

बालपन से तरुणाई
तरुणाई से हरित यौवन
ढीली होती त्वचा, घटती शक्ति
बढती हुई ईश्वर भक्ति
चार कंधो पर सेज, निर्याण
वही आत्मा, नयी जान
हाय रे जीवन का खेल
नित वही ठेल, रेलमपेल   

मौसम का हर महीने बदलता तेवर
हर शाम झींगुरों का बदलता स्वर
पर्वत शिखरों पर हिमपात
वहीँ अभ्युदित होता जल-प्रपात
नदी बहकती चली, हेतु सागर मिलन
भाप बन पानी का यूँ सतत रूप-गमन
जी हाँ! परिवर्तन ही परिवर्तन


(ओंकारनाथ मिश्र, सेंट्रल, ११ अगस्त २०१३)