Wednesday, November 19, 2014

शीत के दिन आ गए हैं

शीत के दिन आ गए हैं
घन गगन पर छा गए है
पत्ते भी मुरझा गए हैं
और प्रगल्भा पूछती है कब मिलोगे
कब तलक कविता-मधुर से तुम छलोगे
फिर विरागी सुर में वो कुछ गा गए हैं
शीत के दिन आ गए हैं

सिन्धु छूकर वो निदय हो बह चली है
उसके चर्चों से चतुर्दिक खलबली है   
उसकी पैनी धार से विश्रब्ध हो ठहरे हैं सब
आयेगा लेकर दिवाकर अपनी रश्मि, तेज कब
सोचकर ये हम दुबक कर सो गए हैं
कल्पना के लोक में ज्यों खो गए हैं
और वहां भी फूल सब कुम्हला गए हैं
शीत के दिन आ गए हैं

‘’उनका मुख था शरद के उस चाँद जैसा
चाँद जैसा, शरद के उस चाँद जैसा’’
हमने उपमा ये, पुराणों में पढ़ी थी
व्यास जानें, ये उन्होंने क्यों गढ़ी थी
पर लालायित हो गए हम देखने
निकल आये नेत्र अपने सेंकने
पर जुन्हाई, मन ना भाई
सकल दृष्टि में जो आया, दाग था
मन में संचित, व्यास को उपराग था
हाय! मिथ्या क्यों हमें बतला गए हैं
शीत के दिन आ गए हैं

सृप्त था कवि, सुप्त था, अब जागता है
नक्तचर हो चाँद के संग भागता है  
पर निराशा ही छुपी थी भाम में
दाग कायम रात्रि के इस याम में
पृथ्वी जब तक, ये नहीं ढँक पायेगा
चाँद में, जी! दाग है, रह जाएगा
देखकर कहिये कि हम झुठला गए हैं?
शीत के दिन आ गए हैं

(निहार रंजन, ऑर्चर्ड स्ट्रीट, १९ नवम्बर २०१४)

(बीते ६ नवम्बर को पूर्णिमा के चाँद की यह तस्वीर मैंने उतारी थी. आप भी देखिये)

15 comments:

  1. वाह बहुत ही सुन्‍दर। शीत के दिनों में जब चांद आजकल दिख ही नहीं रहा, आपकी कविता शरद के चांद का जिक्र क्‍या कर गई, मन उल्‍लास से भर गया है।

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  2. रचना पढ़ बहुत नये नये शब्द से परिचय हुआ .... आभार

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  3. बहुत ही सुन्दर ... शीत के चाँद की कल्पना और कल्पना में बुने अनेकों पल, उपमाएं ... स्फुटित झरने से बहती रचना ...

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  4. सुन्दर रचना !
    मेरे ब्लॉग डायनामिक पर आपका स्वागत है !
    अगर आपको मेरी पोस्ट पसंद आये तो कृपया फॉलो कर हमारा मार्गदर्शन करे

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  5. चाँद पर जो दाग हैं वे क्या वैसे ही नहीं जैसे तितली के परों पर बुंदकियाँ..सुंदर कविता..

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  6. अति सुन्दर।
    हर शब्द चाँद को सीते हुए कविता मे।

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  7. शब्द और भावों का संयोजन बखूबी बहुत सुन्दर करते है आप निहार जी,
    पढ़ते पढ़ते मन उन भावों में खो जाता है, शीत का इतना सुन्दर वर्णन कमाल है !
    बहुत बढ़िया लगी यह रचना ! तर्कों से कब चाँद का सौंदर्य दिखा है ?

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  8. कल 07/दिसंबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  9. कविता और चित्र, दोनों ही सुन्‍दर

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  10. विश्रब्ध हो ठहर गए है हम इस चाँद को देख कर और इस शीत में भींग कर ...

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  11. चांद में चाहे दाग हो है तो वह खूबसूरत ही,
    शीत के दिन आ गये हैं बात ये तो कही सही।
    अनोखी प्रस्तुति।

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  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.....

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  13. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति शीत के दिनों में

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  14. इस दूर के चाँद से हमें न ठगिए साहब
    शीत की तो बात ही जुदा है
    सुन्दर है पोस्ट।

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  15. नवीन ..चिर नवीन ..

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