Sunday, September 15, 2013

पुनः जंगलों में

पचास साल गुजार कर
सारा ‘संसार’ पाकर  
उम्र के इस पड़ाव पर
वो भाग जाना चाहता है
पूरब की ओर
क्योंकि पूरब में है ‘ह्वंग ह’
और ‘ह्वंग ह’  ‘माँ’ है
इसलिए वो जाना चाहता है
इसी माँ के पास क्योंकि
माँ का प्रेम विपुल है
निःस्वार्थ भी

उसे देह का प्यार
बहुत मिला है लेकिन
उसकी आत्मा
तलाश करती है सच्चे प्यार को
सो वो निकल पड़ा है
अपने टूटे “डी” स्ट्रिंग वाली 
इलेक्ट्रिक गिटार के साथ
‘फ्रेडी किंग’ और ‘एरिक क्लैप्टन’ की तरह
“हैव यू एवर लव्ड अ वुमन” गाते हुए

ताकि शोक की नदी, पीली नदी
उसके ज़र्द चेहरे को देखे  
उसकी संतप्त आवाज़ सुने
और अपनी धारा से
बहा ले जाए उसे
तीर के दूसरी तरफ
जहाँ उसकी प्रियतम बैठी  है   

यही फितरत है इंसान की
जंगलों से भागता है शहर की ओर
महल बनाता है
सारे साजो-सामान बिछाता है
कमरे को रोशन करता है लेकिन
अपने अंतस के अन्धकार को
मिटा नहीं पाता है
क्योंकि महलों के कमरे 
रौशन हो के भी 
घने अन्धकार में डूबे है
इसलिए वो जाना चाहता है  
फिर से जंगलों में, नदी के तीर पर  
ताकि मुक्त कंठ से वो गा सके
“हैव यू एवर लव्ड अ वुमन”

(निहार रंजन, सेंट्रल, १५ सितम्बर २०१५)


‘ह्वंग ह’- चीन की नदी (Yellow River) 

21 comments:

  1. ताकि मुक्त कंठ से वो गा सके
    ...
    इंसानी फितरत बयाँ करती एक सुन्दर सहज पोस्ट....

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  2. मुक्तकंठ गा पाने की जरा सी भी सम्भावना जहाँ हो, वहाँ पहुँचने को, देर सबेर ही सही, आत्मा उद्धत तो होती ही है...

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  3. किसे चाह नहीं सच्चे प्यार की.....
    और प्यार की गुणवत्ता कृत्रिमता में नहीं मिलती ..

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  4. ये इंसानी जंग है जो हमेशा रहती है ... दूर चाहे कितना भी दूर चला जाए ... बहुत कुछ अपने साथ रखता है जहां लौटना ही उसका ख्वाब होता है ...

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  5. सत्‍य है कि महलों के साजो-सामान, कृत्रिम प्रकाश मनुष्‍य के अन्‍तर्मन को नहीं चमका सकते। जहां जीवन का अन्‍कुर फूटा, उस धरा के लिए हम क्‍या कर पाते हैं। अन्‍यत्र जा कर स्‍वयं को संसाधित करते हैं, जो असन्‍तुष्टि और आत्‍मग्‍लानि ही उत्‍पन्‍न करता है। कविता में ऐसी टीस अच्‍छे से उभरी है।

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  6. निहार भाई हैट्स ऑफ इसके लिए। ……जीवन का बड़ा गहरा दर्शन समेटे अद्भुत भावों से सजी ये पोस्ट लाजवाब है हालाँकि मुझे कविता में न जाने क्यूँ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग पसंद नहीं आता परन्तु आपने बड़ी सुन्दरता से इसे पिरोया है जिसने इसमें चार चाँद लगा दिए । कई दिनों तक याद रहने वाली और छाप छोड़ देने वाली इस पोस्ट के लिए हार्दिक शुभकामनायें आपको |

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  7. नमस्कार आपकी यह रचना कल मंगलवार (17-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. हैट्स ऑफ....बहुत सुन्दर....

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  9. लौट तो आना चाहता है परन्तु कितना कुछ खोकर ? काश! ये गान पहले ही गुनगुना लेता .. अति सुन्दर कृति..

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  10. यही फितरत है इंसान की
    जंगलों से भागता है शहर की ओर......सुन्दर

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  11. बहुत सुन्दर भाव और रचना |
    आशा

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  12. कमरे को रोशन करता है लेकिन
    अपने अंतस के अन्धकार को
    मिटा नहीं पाता है...अक्सर हम सभी ऐसा करते हैं ..हैं न ...जब अपना आप छिपाते हैं.....

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  13. सच्चा प्यार ही मन के अन्धकार को दूरकर सकता है
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  14. इन्सान की यह फितरत ही है,अंत में शांति खोज में भटकता है कितना भी दूर चले जाए पर हमारी जीवन से असन्तुष्टि नही मिटती ,बहुत ही सुन्दर भावों को आपने बखूबी प्रस्तुत कियें है, आभार।

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  15. सुंदर अभिव्यक्ति

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  16. बहुत उम्दा .. पूरब में होंग है, इंसान पहले जंगल से शहर की ओर भागता है और फिर शहर से जंगल की ओर, परमात्मा तो आखिर शांति ही है ..या शांति में ही है .. सुन्दर रचना..

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  17. यह दौड़ सदैव चलती रहती है..बहुत सुन्दर और गहन अभिव्यक्ति...

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  18. फिर से जंगलों में, नदी के तीर पर
    ताकि मुक्त कंठ से वो गा सके
    “हैव यू एवर लव्ड अ वुमन”
    ...........बहुत ही सुन्दर भावों को बखूबी प्रस्तुत कियें है

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  19. एक अद्भुत रुमान लोक को रचती कविता -मेरो मन कहाँ अनत सुख पावे

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