Monday, January 6, 2014

शाम घिर आई है

फिर वही, संध्या सुंदरी है
फिर वही, कुसुम-निढाल चंचरी है
फिर वही, मनमोही अरुणाभा है
फिर वही, वादियों में तिमिर जागा है
फिर वही, क्षितिज में व्याप्त तन्हाई है
शाम घिर आई है

फिर वही, रिक्त आकाश है
फिर वही, अभ्रित-भास है
फिर वही, पक्षी-दल उड्डीन हैं
फिर वही, घर लौटने सब लीन हैं
फिर वही, रिझाती शाद्वल-खाई है
शाम घिर आई है

फिर वही, भयद नीरवता है
फिर वही, तनु तुहिन मन रमता है
फिर वही, शीत की दुश्वारी है
फिर वही, नील नभ क्लम-हारी है
फिर वही, चतुर्दिक शान्ति छाई है
शाम घिर आई है 

फिर वही, सड़क पर कोई भुट्टा बेचती है
फिर वही, निर्दयी हवा उसका तन बेधती है
फिर वही, किसी का हाथ खाली है
फिर वही, उजाला है, बदहाली है
फिर वही, ऊपर वादियाँ हैं, रानाई है
फिर वही, नीचे नंगी सच्चाई है
शाम घिर आई है

(निहार रंजन, सेंट्रल, ६ जनवरी २०१४ ) 


(वादियों में नए साल के प्रथम सूर्यावसान की बेला )  


(वादियों के नीचे रात के आगोश में जाती संध्या)

26 comments:

  1. साल के पहले और छठवें दिन का फर्क है भाई...नव वर्ष का आग़ाज़ उम्मीदों से फिर वही शाम का शुबहा...

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  2. " फिर वही, चतुर्दिक शान्ति छाई है
    शाम घिर आई है "

    कविता शाम को उकेरती गयी...
    संध्या बेला की नीरवता को खूब लिखा!
    Nice clicks as well...!

    Wishing you a creative and successful 2014!

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  3. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, जब मन खली हो तो सर्दियों की शाम बहुत खलती है .. अच्छी रचना ..

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  4. फिर वही, रिक्त आकाश है
    फिर वही, अभ्रित-भास है

    उत्कृष्ट भाव व सुंदर अभिव्यक्ति व चित्र भी लाजवाब ....जैसे उड़ते पंछी नीड़ की ओर ....

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  5. उत्कृष्ट भाव व सुंदर अभिव्यक्ति व चित्र भी लाजवाब .....
    जीवन में उजास ही उजास हो ...

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  6. फिर वही, सड़क पर कोई भुट्टा बेचती है
    फिर वही, निर्दयी हवा उसका तन बेधती है....... खूब बहुत...सुन्दर रचना .....

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  7. ढ़लते हुए शाम का का सुंदर अभिव्यक्ति.... बहुत सुंदर ....!!

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  8. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जले पर नमक - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  9. संध्या सुंदरी का रूप अति मनभावन है। अति सुंदर रचना के लिए बधाई....

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  10. संध्या का मनभावन चित्रण..... लेकिन आखिरी बंद की मार्मिकता हृदय में टीस जगाती है आपका शब्दज्ञान भी नमन योग्य है

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  11. बहुत सुन्दर किन्तु प्रकृति उस "फिर वही "दुहाराएगी |
    नई पोस्ट सर्दी का मौसम!
    नई पोस्ट लघु कथा

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  12. फिर फिर तो वही है, तो फिर नया क्‍या है......शायद आशाएं! शुभकामनाएं।

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  13. वाह बहुत ही शानदार |

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  14. भावो का सुन्दर समायोजन......

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  15. wah kya bat hai .........sab kuchh vahi

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  16. bahut hi sundar likha hai apne ......sb kuchh vahi hai fir bhi sal to naya hai na .....Happy New Year

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  17. कल 10/01/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  18. बहुत खूब .. शाम के हर मंज़र को उसके अनेक शेड्स को शब्दों में उतारने का लाजवाब प्रयास है ये रचना ... नव वर्ष मंगलमय हो ..

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  19. तारीखें बदल जाने से ज़िंदगी नहीं बदलती...फिर वही रात है ख्वाबों की....लेकिन फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है शायद कुछ नया हो ...नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

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  20. भावपूर्ण सुन्दर रचना |

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  21. बहुत खूब ! संध्या के प्राकृतिक एवँ सांसारिक हर रंग को बखूबी समेटा है आपने रचना में ! तस्वीरें भी पूरक हैं हर भाव की ! बहुत सुंदर !

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  22. शाम घिर आई है
    गीत की बेला आयी :)
    बहुत सुन्दर भाव भरी रचना
    और चित्र भी बहुत सुन्दर है !

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  23. फिर वही, शीत की दुश्वारी है
    फिर वही, नील नभ क्लम-हारी है
    फिर वही, चतुर्दिक शान्ति छाई है
    शाम घिर आई है
    ....दिल को छूते अहसास और उनका अद्भुत प्रभावी चित्रण...

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  24. विडंबनाएं बार बार उभरती हैं दृग क्षेत्र में!

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