Tuesday, May 7, 2013

चाँद से शिकायत


देख ली तुम्हारी हकीकत
निर्जन, निर्वात, पथरीला
यही सच है तुम्हारा
झूठे मामा मेरे बचपन के
पर-आभा से चमकने वाले
क्यों मैं पूजूं तुम्हें?

पंद्रह दिनों के चक्र में
फर्श से अर्श तक
और अर्श से फर्श तक
पेंडुलम की तरह झूलने वाले
कोई चाहता तो आभा तुझमे
कोई चाहता तो घोर तमस्क
तुझसे अच्छे तारे मेरे दूर गगन में
टिम-टिम करते रहते बिना थकन के

तुझको जाना बचपन से प्यारे हो तुम
पर माँ ने बताया नहीं तेरा सच
कितने बेबस और लाचार हो तुम
सूरज की चमक बिन बिलकुल बेकार हो तुम
क्या है प्यारा तुझमे ?
पूनम की रात का दागदार रूप?
हर निशा की मिन्हाई जुन्हाई ?
या अमावस की रात तुझसे मिली तन्हाई ?

पूज लेता मैं तुम्हे
होती चमक अगर तुझमे अपनी 
और हर रात मेरी झलकरानी
नुपुर-ध्वनि लिए कोसों से कौतूहल जगाये  
कोसी किनारे धेमुराघाट पर आती
और कभी ना कह पाती मुझसे
आज अमावस की रात है!

(निहार रंजन , सेंट्रल,  ७ मई २०१३) 

16 comments:

  1. चाँद तुम्हे मैं क्यों पूजूँ , जिसका ना प्रकाश स्थायी और ना आकार .

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  2. चाँद को विभिन्न आयामों से कवि अपनाता है ... अलग अलग नज़रिए से शब्दों का जामा पहनाता है ... आपने भी नए अंदाज़ में लिखा है उसे ... बहुत खूब ...

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  3. पूनम के रात का दागदार रूप? बहुत खूब सुंदर प्रस्तुति!!

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  4. चाहे जितनी भी कमिया हो पर चाँद तो चाँद ही हैं ना अकेलेपन का हमसफर।।

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  5. चाँद का प्रकाश अपना नहीं , उसका क्या कुसूर . यह प्रकृति की माया है !

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  6. बहुत खूब साब |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  7. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 10-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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    1. हलचल में शामिल करने के लिए धन्यवाद.

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  8. चाँद का अपना ही रूप होता है
    आपने इसे बिलकुल नये संदर्भ में
    धरती पर उतार लिया है
    सुंदर रचना
    बधाई







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  9. ये बाल-सुलभ सी शिकायत बड़ी ही प्यारी और मीठी है ..

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  10. सुंदर... चंदामामा सोच में पड़े होंगें

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  11. wah bhayee ji bahut umda shbdon ne vyakt ki hai chand ki vasavikta ko.

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  12. शिकायत तो आपकी उम्दा है ...

    पता नहीं ....ये चाँद कब तक हम सब को बहलायेगा-फुसलाएगा.....

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  13. नुपुर-ध्वनि लिए कोसों से कौतूहल जगाये
    कोसी किनारे धेमुराघाट पर आती
    और कभी ना कह पाती मुझसे
    आज अमावस की रात है!
    .
    .
    .wah wah

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  14. चाँद के चेहरे पर भी स्मित मुस्कान उभर आई होगी!

    भोली सी शिकायत है!
    सुन्दर सी कविता है!

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