Thursday, November 26, 2015

छोटी सी बात


अपने ही ह्रदय की
अनिश्चित सीमाओं में
और अनिश्चितताओं के बीच
बंधी है अब भी वही तस्वीर
वही गीत (‘होरी’ गीत)
वही संगीत, कल्पना और उसका रोमांच
और अपनी जमीन का वह विशाल चुम्बक
मेरे खेत, धान की बालियाँ और मेरी माँ
छोटा सा दिन और छोटा सा जीवन
अपनी अँजुरी में क्या-क्या लूँ
अपनी बातों में क्या-क्या कहूं
सुबह होती है, शाम होता है
जीवन का बस इतना काम होता है


(निहार रंजन, बनगाँव, २७ नवम्बर २०१५)

6 comments:

  1. बहुत सुंदर। छोटी सी बात दिल को छू गयी।

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  2. मैं इस बात को खूब मजबूती से समझता और एहसास करता हूँ कि इस छोटी सी बात में जो मजा-मस्ती है, वो सब नहीं जान सकते. सच में कितना विशाल चुम्बक है वो। आज भी मुझे उसी तरह से अपनी ओर खिंच रहा है, जैसे बचपन के दिनों में खींचता था.

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  3. सुबह से शाम होता है,उम्र यूं हीं तमाम होती है।

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 5 दिसंबर 2015 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  5. बात तो इतनी ही है पर कितनी गहरी है ...

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