Monday, April 15, 2013

कैसे तज दूं ‘प्राण’ को!


ये मेरी मंजुल-मुखी,
खो ना जाए इस तमस में
इसलिए है छुपा रखा
मैंने इसे पंजर-कफस में
संग मेरे  स्वप्न में
संग है हर श्वास में
अरुणिमा सी मुदित करती
मेरे मन आकाश में
घूमती रहती है निशदिन
सींचती मुस्कान को
कैसे तज दूं ‘प्राण’ को!

जादुई इसकी छवि है
दहकते से इसके अधरज
देख जिसको मन ने बोला
कौन जाए इसको त्यज
मधुरिमा संसार की
संसार की रानाइयां
संसार की अटखेलियाँ
संसार की रुस्वाइयां
झनकती पाजेब इसकी
करती गुंजित कान को
कैसे तज दूं ‘प्राण’ को!

ये मेरी चंचल सखी
करती मुझे उद्भ्रांत है
और फिर चुपके से छूकर
कर देती मन शांत है
ये जो इसके नाज़-नखरे
और ये पुतली का जाल 
अलकों-पलकों की दुश्वारी
उस पर ये वाचाल
चमका देती मन में सूरज
हो आशा अवसान तो
कैसे तज दूं ‘प्राण’ को

ना गलबांही, ना आलिंगन
ना मेरे अधरों से चुम्बन  
मांगे बस बरसों से मुझसे
हर पल का निःस्वार्थ समर्पण 
फिर मेरे प्रतप्त ह्रदय को
करती है शीकर से सिंचन
मुस्काकर जब वो कह देती
धृतिमान हो! ‘करना करग्रहण’
ठहरे मेरे मन में फिर से  
ले आती तूफ़ान वो   
कैसे तज दूं ‘प्राण’ को

(निहार रंजन, सेंट्रल, १४ अप्रैल २०१३) 

19 comments:

  1. मुस्काकर जब वो कह देती
    धृतिमान हो! ‘करना करग्रहण’
    ------------------------
    जादुई व अद्भुत पोस्ट . समर्पित ह्रदय से उकेरी गयी शब्दों की खूबसूरत पेंटिंग ....

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  2. बहुत ही सुन्दर और बेहतरीन रचना,आभार.

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  3. बहुत सुंदर भाव लिए बेहतरीन रचना

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  4. कैसे तज दूं ‘प्राण’ को
    जब जीने के लिए इतने सारे कारण हैं तो ...
    ढेरों शुभकामनायें ......

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  5. बहुत खुबसूरत रचना

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  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति....

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  7. ना गलबांही, ना आलिंगन
    ना मेरे अधरों से चुम्बन
    मांगे बस बरसों से मुझसे
    हर पल का निःस्वार्थ समर्पण ...
    ये समर्पण जीने की प्रेरणा है ... जीने की कुंजी है ...
    मुक्त हो के उड़ने तो प्राण प्रिय को ...

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  8. वाह......गहन और सुन्दर।

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  9. गहन अनुभूति को प्रेरित करती रचना!!

    आन्दोलित करती स्वर लहरी…… आभार

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  10. खूबसूरत प्राण-पण से लिखी रचना....छायावाद की धूपछांही रंग लिए...

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  11. गहन भाव और सुन्दर रचना

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  12. ठहरे मेरे मन में फिर से
    ले आती तूफ़ान वो
    कैसे तज दूं ‘प्राण’ को
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति... शुभकामनायें

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  13. मांगे बस बरसों से मुझसे
    हर पल का निःस्वार्थ समर्पण.....very nice...

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  14. बेहतरीन अभिव्यक्ति...

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  15. बेहद खूबसूरत रचना ...पढ़ी तो थी ....जल्दी में थी तो दो शब्द नहीं लिख पाई थी ...!!

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  16. काव्यामृत का पान कर आनंदित हुआ मन..

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