Monday, July 27, 2015

एक रुदाद

सर कलम करके वो आये हाथ अपने धो लिए
था लिखा रोना हमारे भाग में हम रो लिए

कह रहे थे सबसे वो करते हुए ज़िक्र-ए-रहम
तुम मनाओ खैर लेना चार था हम दो लिए

साक्ष्य भी था रक्त भी, सिसकी, किलोलें, सब के सब
जांच में पर थी सियासत सब के सब ही खो लिए

है शिकायत हाथ में जायें मगर हम किसके पास
वक्त का एक बोझ है कहकर अभी हम ढो लिए

पट्टी जिनके आँख पर हाथों तराजू जिनके है
मुख खुलेगा उनका जब तक कितने रुखसत हो लिए

हम गरीबों की सदायें शायद जगेंगी एक दिन
सोचते ही सोचते लो आज भी हम सो लिए

(निहार रंजन, हरिद्वार, २० जुलाई २०१५)

8 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 28 जुलाई 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. वाह बहुत बढ़िया ...

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  3. पट्टी जिनके आँख पर हाथों तराजू जिनके है
    मुख खुलेगा उनका जब तक कितने रुखसत हो लिए ...
    हर शेर चुभता है ... सच के पास ही बैठ के लिखी गयी पूरी ग़ज़ल है ये ... देश की वर्तमान परिस्थिति, स्वार्थ और राजनीति का कच्चा चिट्ठा है ये ग़ज़ल ... बहुत लाजवाब ...

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  4. साक्ष्य भी था रक्त भी, सिसकी, किलोलें, सब के सब
    जांच में पर थी सियासत सब के सब ही खो लिए..... बहुत खूब...लाजवाब ग़ज़ल, हर शेर नायब, दिली मुबारकवाद.

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  5. अच्छे वक्त का इन्तजार करते जिन्दगी गुजर जाती है सच . बहुत सुन्दर ..

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  6. पट्टी जिनके आँख पर हाथों तराजू जिनके है
    मुख खुलेगा उनका जब तक कितने रुखसत हो लिए
    ...वाह...एक एक शेर सच को आइना दिखता हुआ...दिल को छूती ग़ज़ल

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  7. बहुत ही बेहतरीन है कुछ hindi quotes भी पढ़े

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  8. पट्टी जिनके आँख पर हाथों तराजू जिनके है
    मुख खुलेगा उनका जब तक कितने रुखसत हो लिए
    ............दिल को छूती ग़ज़ल

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