Sunday, June 22, 2014

कलम! कहो

कलम! धुंआ है, आग है, पानी है
कलम! इसी से लिखनी तुझे कहानी है
कलम! दुःख है, स्नेह है, निराशा है, आशा है
कलम! सबके जीवन में इसी का बासा है
कलम! दिल है कि बुझता है, जलता है
कलम! दिल है कि पिघलता है, मचलता है
कलम! देख लो क्या-क्या है जीवन की अदा में
कलम! ढूंढो क्या छुपा है सिंजन की सदा में  
कलम! बहो कुछ ऐसे कि दिल तर जाए
कलम! कहो कुछ ऐसे कि दिल भर जाए

कलम! मिटटी का वही घिसा पिटा खेल है
कलम! सबका बस यही दो दिन का मेल है
कलम! क्यों न सबके हृदय में रसोद्रेक हो
कलम! क्यों न सब ह्रदय नेक हो
कलम! क्षणिक अहं से अधिक क्या है जंघा की ताल में
कलम! उनसे कह दो बहुत चक्र है समय की चाल में
कलम! कुछ कह दो उनसे जो त्यौरियां चढाते है
कलम! कुछ कह दो उनसे जो गीत नहीं गाते हैं
कलम! छेड़ ऐसी धुन कि दिल ठहर जाये
कलम! कहो कुछ ऐसे कि दिल भर जाए

कलम! कवि की कल्पना अमन ही अमन है
कलम! कवि की चाह आग का शमन है
कलम! कवि के शब्द कब से पुकारे
कलम! फिर भी क्यों उठती रहती हैं तलवारें
कलम! पूरी दुनिया ही कवि का ह्रदय हो
कलम! स्नेह की सरिता में सबका विलय हो  
कलम! कुंद हो जाए हर तेग की धार
कलम! यह कवि स्वप्न कभी हो साकार
कलम! किसी होंठ से कभी ना शरर आए  
कलम! कहो कुछ ऐसे कि दिल भर जाए

कलम! ये धार है अब हम इसमें बह निकले
कलम! फिकर रही नहीं जहाँ चले ये चले
कलम! रोको ना इसे, हवा है ये बहने दो  
कलम! पुरआवाज़ इसे आज ही सब कहने दो
कलम! बहने की किसी चीज को रोको न कभी
कलम! जो बढ़ गए आगे उसे टोको न कभी
कलम! इस शून्य में अब क्या जोड़े  
कलम! नव गीत लिखने को हैं दिन थोड़े
कलम! लिखो कि दिल में लहर आये
कलम! कहो कुछ ऐसे कि दिल भर जाए


( निहार रंजन, समिट स्ट्रीट, २२ जून २०१४)

Wednesday, June 11, 2014

तह

शोणित व नख व मांस, वसा
अंगुल शिखरों तक कसा कसा  
आड़ी तिरछी रेखाओं में 
कहते, होता है भाग्य बसा
हाथों की दुनिया इतनी सी
वो उसका हो या मेरा हो
फिर क्यों विभेद इन हाथों में
गर चुम्बन लक्ष्य ही तेरा हो

हाथें तब भी होंगी ये ही
रुधिर में धार यही होगा  
रेखाविहीन इन हाथों में
जब श्रम-पतवार नहीं होगा
ओ! हथचुम्बन के चिर प्रेमी
उस दिन ऐसे ही चूमोगे ?
जिस दिन जड़वत हो जाऊँगा
क्या देख मुझे तुम झूमोगे?

यूँ बार बार चूमोगे तो
ग्रंथि तेरी खुल जायेगी
जिस सच पर पर्दा डाल रहे
खुद अपनी बात बताएगी
उभरेंगी  फिर से रेखाएं
जिनका हाथों पर नाम नहीं
कौशल किलोल कर जाएगा
आओ दे दो अब दाम सही

भोलेपन से अब कितना छल
हे मधुराधर के चिर-चोषक
सौ-सौ मशाल ले आये हैं
व्याकुल सारे पावक-पोषक
ठहरो! ठहरो! ये जान गए
क्यों मादकता की मची धूम
ये खूब जानते हैं क्यों तुम
इन हाथों को हो रहे चूम

स्वार्थें ही होती है तह में
संबंधों की इस संसृति में
गांठें नाभि की जब खुलती
कह देती, क्या उनकी मति में
निस्सीम प्रसृति है इसकी
नहीं शेष कोई पृथ्वी पर ठौर
वो बस माँ है और मिटटी है
होती जिसकी है बात और

(निहार रंजन, समिट स्ट्रीट,  ९ जून २०१४) 

Friday, June 6, 2014

पास-ए-ठक्कन बाबू

इस इक्कीसवी सदी में इतना हो चुका है
पर आकुल ज्वाला के साथ आई
इन अग्नि सिक्त फूलों में ना रंग है
ना महक है
ना दूर-दूर तक कोई चहक है
बस, कसक ही कसक है

और मेरे विक्षिप्त मन से निक्षिप्त शब्दों  में
उद्वेलित सागर की उत्तरंग लहरों सा उफान है
पर सच है, इन प्रश्नों का उत्तर बहुत मूल्यवान है
दशकों से याचित यह प्रश्न
मेरे ह्रदय का निरुपाय विकार है
सो मुझे ‘पतिता’ के संग भाग जाना भी स्वीकार है
क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है
कि सांस लेती ये बुतें भी
अगर अपनी छाती चीर लें
तो राम ही राम दिखेगा
पर हो नहीं पाता है
वो राम-राम करती रहती है
तभी काला-जार से इनका राम नाम हो जाता है  
और ठक्कन बाबू की पवित्र सीता की देह
किसी पतिता की देह बन जाती है
क्यों, किसलिए, कोई नहीं कहता है मुझसे ?
इक्कीसवी सदी के इस समाज में!

सो ठक्कन बाबू !
मैं आग लगाऊं, वो भी ठीक नहीं
मैं दाग लगाऊं, वो भी ठीक नहीं
चिराग बुझा है, दीया सूखा है
गया का हरेक कौवा भूखा है
माना, पतिताओं के डिगे कदम है
पर समय बहुत कम है  
आइये, हाथ मिलाइये
आइये, उन काली किताबों को जलाइये
जिसमे छियासठी का षोडशी से मेल पवित्र है
जिसमे सिर्फ सीताओं का दूषित चरित्र है
भाग जाने दीजिये मुझे ‘पतिता’ के संग
और ढोल बजवा दीजिये पूरे गाँव में
कि मेरी वासना की निर्लज्ज नागिन  
पागलों की तरह नाचने चली गयी है
इक्कीसवी सदी के इस समाज में!

अब और देर नहीं
इन मरियल चिताओं को जलाने का सामर्थ्य नहीं
इनमे धुंआ भी नहीं कि दम घुट जाए
लकड़सेज पर लेटी यह ‘फुलपरासवाली’
हर रोज मुझसे बहुत बकबक करती है
बहुत बातूनी है  
ठक्कन बाबू! इसके होंठ सी दीजिये


(निहार रंजन, समिट स्ट्रीट, ६ जून २०१४)

Thursday, June 5, 2014

सन्देश

अबकी, जबकि मैं निकल पड़ा हूँ तो
या जंगल में आग होगी
या मेरे हाथों में नाग होगा
पर इतना ज़रूर तय है
कि मेरी छह-दो की यह काया
दंश से बेदाग़ होगा

पूरे जंगल में मैंने घूम कर देख लिया है
दूध और बिना दूध के थनों और स्तनों को पी-पी कर
एक तरफ धामिन और नाग का मिलाप हो रहा है
और दूसरी तरफ बस विलाप ही विलाप हो रहा है

इसीलिए मैंने नागों से कह दिया है
कि तुम्हारे विष की ज़रुरत
बस मेरे प्रयोगशाला तक है
जिससे  मैं हर रोज ‘आर.एन.ए’ पचाता हूँ
और ‘एच.पी.एल.सी’ में चढ़ाता हूँ
उसके आगे कहीं और तुम्हारा फन तनेगा  
तो ये सारा जंगल जलेगा
लेकिन किसी भी हाल भी
वस्त्रावृत या वस्त्रहीन देह पर
नंगा नाच नहीं चलेगा


(निहार रंजन, समिट स्ट्रीट,५ जून २०१४)

Friday, May 30, 2014

मोरचंग

कौन जानता है
किसकी दंतपंक्ति है,
किसका हाथ है
किसका 'तार' है
कौन वो रूपोश है
किसका ये विस्तार है 

नहीं, संगीत नहीं
नहीं, नहीं, नहीं
इनमें संगीत नहीं
नाद नहीं,  नर्दन है 
क्रंदन है, घोर क्रंदन है
अप्रत्यास्थ है, अखंडनीय है,  अधर्षनीय है
कितना जिद्दी है
बजता ही रहता है
प्रारंभ से अंत तक
यह मोरचंग
क्यों, किसलिए
कौन जान पाया है ?

(निहार रंजन, समिट स्ट्रीट, २७ मई २०१४)

Saturday, May 24, 2014

आज की रात

उधर से तुम हाथ उठाओ, इधर से हम हाथ उठायें
इसी तरह से, चलो जश्न की रात बिताएं

कई दिन हैं बीते, तो ये रात आई 
किस्सा बड़ा है, हम कैसे सुनायें 

मुन्तज़िर तुम भी थे, मुन्तजिर मैं भी था 
लो आखिर में चल ही पड़ी हैं हवाएं 

जुबां पर आ ना सकेगी दूरियों की बात 
खरामा-खरामा कदम तो बढायें 

बातों-बातों में, गयी रात सारी  
उठायें सदा हम, सुबह को बुलाएं

(निहार रंजन, समिट स्ट्रीट, २४ मई २०१४ )

Saturday, May 17, 2014

देहाती बातें

बहुत शान्ति है इस खटिये में
जिसमे धंस कर, धंस जाता हूँ अपने आप में
बहुत दूर, बहुत अंदर, आत्मिक-आलाप में
जिसमे न बल्ब है, न रौशनी है
न शोर है, न मांग है, न आपूर्ति है
ना विरोध है, ना स्वीकृति है
न स्वाप्तिक उपवन है, न अवचेतन है, न सच्ची जागृति है
है तो बस खाट के ये चार खूंटे
इनसे चिपटी हरे बांस की ये बत्तीयाँ
बत्तीयों में तनी यह मच्छरदानी
उसके ऊपर धेमरा बथान की नयी फूस का छत
और ये चार दीवारें टाट की
जिनसे गुजरती है कोसी की अलसायी यह आर्द्र हवा
कभी हिमालयी पवन की तरह
तो कभी तापगृह के वाष्प-कक्ष की तरह
और मैं मरा पड़ा सोचता हूँ
हिताची, कब आएगा यहाँ हितैषी बनकर?

इसी अभिलाषा के बीच देखता हूँ
टाट के यथार्थरूप को
जिसके फांको के बीच खड़ी है लालगंज वाली काकी
तुलसी को करती अर्पित जल-फूल
करती हुई अपनी शंकाओं को निर्मूल
सोचती मृत्यु बाद, वैतरणी न रहे अनिस्तीर्ण
जुड़ जाए, उसका यह ह्रदय विदीर्ण
लौट आये उसका लाल
जो साठ वर्षीय संसदीय घमासान के बाद भी
कर गया पलायन गाँव से    
टेलीविजन के विज्ञापनों में देखी
सपनों की दुनिया देखने  
टाट की इन दीवारों को,
कंक्रीट की दीवारों में परिवर्तित करने
भानस-घर, चिनबार को
‘मॉड्यूलर किचेन’ का रूप देने
और तभी विचिन्ता में डूब जाता हूँ मैं
कि ‘परमेष्टि’ की परिभाषा कितनी बदल गयी है
दो पीढ़ियों के बीच

बहुत बदल गयी है, बहुत बातें
इस झोपड़ी से उस संसद तक
पर बदली नहीं ठगी
उस लाल ने देश को ठगा
इस लाल ने लालगंज वाली काकी को
जो कर गया था प्रत्यागमन की बात
साल दो साल में, किसी भी हाल में
और जा फंसा है महानगर के नागरी व्यामोह में
खो गया है ज्यों किसी शिखर के आरोह में
या पिसती जिंदगी में ही देखता है मोक्ष
उस लाल का ठगा यह लाल  
फिर गाँव क्या, शहर क्या ?

यही कुछ बातें है, देहाती बातें  
जो खाट की शान्ति में मिलती है मुझे
और पार्श्व में द्वन्दरत पड़ोसियों के श्रीमुख से 
देसी गालियों की अनाहूत वर्षा
जिसकी जड़ में
खुरखुर झा नहीं है
सेहेंता गोबरपथनी नहीं है
कोई लाल ही है
लालगंज वाली काकी नहीं  


(निहार रंजन, समिट स्ट्रीट, १७ मई २०१४) 

Sunday, May 11, 2014

प्रजातंत्र: चार प्रसंग

प्रसंग एक- कुछ नया नहीं
यह गरीब!
पिसता था, पिसता है, पिसता ही रहेगा  
देह घिसता था, घिसता है, घिसता ही रहेगा

किसी खेत में, किसी कारखाने में, किसी वेश्याघर में
मरेगा, कटेगा, बिकेगा
छला है, जलेगा, भुनेगा
गिरेगा, गिरेगा, गिरेगा

जब-जब चुनाव आयेंगे
कोई गाल छूएगा
कोई भाल चूमेगा
कोई इन्हें सर पर रख
सारा शहर झूमेगा
फिर चुनाव बीतते ही  
लात इनको, बात इनको
कई घोटाले, घात इनको
और यह दुखिया बेचारी
हाथ जोड़े तब खड़ी थी
हाथ जोड़े अब खड़ी है   
पेट से तब भी मरी थी
पेट पर अब भी मरी है
भूख की जिद्दी ये नागिन
फन वो काढ़े तन खड़ी है, तन खड़ी है  
दूध पीती उसके घर से
जिसके हाथों दे दिया बीन हमने
और कहा था 
लो बजाओ! लो बजाओ!
लो भगाओ! लो भगाओ!
पर कभी न बीन बजता,
पर कभी ना दूध घटता
ज्यों की त्यों अब भी अड़ी है
फन वो काढ़े तन खड़ी है, तन खड़ी है  
तन खड़ा है वो भी गिरगिट
झुक गया था जो हमारे पैर पर
जा रहा है पंचवर्षी सैर पर
पूछता है वही हमसे
कौन गिरगिट, कौन उल्लू
बोलो दीनू, बोलो लल्लू !

प्रसंग दो- यहाँ भी, वहाँ भी  
दुनिया के दो बड़े प्रजातंत्रों में रह कर देख लिया मैंने
यह प्रजातंत्र का दोष नहीं
यह अल्पता या प्रचुरता की बात नहीं
कि जब-जब चुनाव आता है
यही धर्म का, नस्ल का विभाजनकारी सिक्का चलता है
हर हाल में गरीब ही पिसता है

प्रसंग तीन- तो दोष किस में ?
क्या वही हमशक्ल अपना
सभ्यता की कर उपेक्षा जो बढ़ा है
अपने गुणसूत्रों में पशुता बचाये
‘सर्वशोषण पाठ’ जींवन में पढ़ा है
और लिया जान है जीवन दौड़ ऐसी
जिसमे कोई साथ उसके न दौड़े
गर कोई हो जाय फिर भी खड़ा तो
करने पंगु सबसे पहले टांग तोड़े
फेंक रोटी उसकी खाली थाल में
कहता उससे लो दबा लो गाल में

प्रसंग चार- हम मूर्ख
दशमुखी के अट्टाहस को फिर ना सुनने को
प्रत्यंचा पर तीर कभी हम तान ना पाए
छः दशकों से ठगे हुए, पहचान ना पाए
बीच हमारे कौन भेड़िया जान ना पाए

(निहार रंजन, समिट स्ट्रीट, १० मई २०१४ )

Monday, May 5, 2014

पिया के पाश में

फिर उसी आनंद की तलाश में
लौट आया हूँ पिया के पाश में

कब कौन जी से चाहता,
पिया से दूर जाना
और पिया बिन
हो वियोगी, कविता बनाना
पर ये जीवन, हाय निर्मम!
कभी हमसे पूछ पाता
है कोई स्नेही,
जिसे बिरहा लुभाता ?
है कोई रागी,
हो जिसे बिछोह-राग?  
है कोई परितुष्ट,
कर अपने कंज-मुखी का त्याग?

पर क्या करे जीवन,
ये जो उदर की आग है
हो कोई भी राग, बंधन
करना पड़ता त्याग है  
सत्य है, जीवन गति का  
ये ही सच्चा मूल है
नित्यशः उसकी ही चिंता,
कौन सकता भूल है   
हैं सभी अनुबद्ध उसमे
मैं भी उसको मानता हूँ
पर हिया जो पीर है
मैं ही केवल जानता हूँ

सो दूर करने क्लेश को
फिर से गाढ़े श्लेष को
आ गया हूँ उस गली में, जिस गली में
स्वप्नलोकी  कुंतला है  
ना कोई चिंता, बला है
और यमस्विनी प्रीतिकर है
समय लगता है, स्थिर है
हूँ जहाँ एकांत में, निर्द्वंद मैं
बंधता हुआ जैसे किसी भुज-बंध में  

.. हा! इस भुज-बंध में
सिमटा हुआ संसार है
और इस संसार में
देखो कितना विस्तार है
जिसमे उड़ता जा रहा हूँ,
इस किनारे, उस किनारे  
चाँदनी में स्निग्ध हो,
छूते हुए असंख्य तारे 
कल्पना के लोक में
रुनझुन रुनकते नाद से  
नव उर्जा का सद-क्षण सहज संचार है
.. हा! पुनः अन्तःस्वनित अति प्रबल यह झनकार है

अब क्या किसी को दोष दें
भूल सारे रोष मैं
उड़ते रहते इस धनी आकाश में
लौट आया हूँ पिया के पाश में   

(निहार रंजन, समिट स्ट्रीट, ५ मई २०१४)